दान देना सबसे बड़ा पुण्य? लेकिन इन बातों का रखें ध्यान – Daan kaise kare – daan punya for happy world

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दान देना सबसे बड़ा पुण्य काम कहा जाता है। दान देने से पहले और बाद में आपके मन की क्या भाव हैं इस पर सब कुछ निर्भर करता है। दान देने का फल तभी मिलता है जब दान देने वाले व्यक्ति के मन में अहंकार या घमंड न हो, दिखावे के लिए किया गया दान सद्फल नहीं देता है। दान देने से पहले और बाद में अपने मन के भावों को स्थिर रखना चाहिए। किसी जरूरतमंद को अपने से छोटा समझ कर दिया गया दान किसी भी लोक में पुण्य नहीं देता है।

गीता में भी प्रभू श्री कृष्ण ने साफ-साफ बताया है कि दान देने वाले की भावना पर ही सबकुछ निर्भर करता है। मन की भावना पवित्र होती है तो दान का फल मृत्युलोक के साथ-साथ सभी लोकों में मिलता है। देवता भी ऐसे दान को से प्रसन्न होते हैं। प्रभु श्री कृष्ण ने गीता में कहा है किः

दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे।
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्‌॥

दान देना महान कर्तव्य है, ऐसी सुभावना से जो दान देश, काल, और योग्य पात्र को देखकर, उपकार की भावना रखे बिना सुपात्रों को दिया जाता है वह सात्त्विक दान कहा गया है ।

यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः।
दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम्‌॥

इस श्लोक में मधुसूदन कहते हैं कि जो दान क्लेशपूर्वक या किसी पर अहसान करने की भावना के साथ अथवा फल के लालच से (मान, प्रतिष्ठा और स्वर्ग की प्राप्ति के लिए अथवा किसी रोग या परेशानी की हटाने के लिए) दिया जाता है, वह दान राजस कहा गया है।

अदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते।
असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम्‌॥

दान देने से पहले ये भी जानना जरूरी है कि आप जिसे दान दे रहे हैं वो जरूरतमंद है या नहीं, साथ ही तिरस्कापूर्वक दिया गया दान भी सुफल नहीं देता है। प्रभू श्री कृष्ण गीता में कहते हैं कि जो दान बिना सत्कार के अथवा तिरस्कारपूर्वक और कुपात्र को दिया जाता है, ऐसे दान तामस कहा गया है।

दानी व्यक्ति जीवन में बहुत उन्नति पाता है, लेकिन दान देने का फल तभी मिल पाता है जब फल की लालसा से दान न दिया गया हो। आज के परिवेष में ये बाद बिल्कुल सही दिखाई पड़ती है। लोग दान देते हुए अहंकार से भरे दिखाई पड़ते हैं, कई बार दान देते हुए फोटा खींच कर सोशल मीडिया पर डालते हैं और खूब वाहवाही बटोरते हैं। ज्ञानियों ने कहा है कि दान तो ऐसे देना चाहिए कि दायें हांथ से दिए दान को बांया हांथ ही न जान पाए।

इसके साथ-साथ दान देने वाले व्यक्ति के मन में किसी भी प्रकार का अहंकार नहीं होना चाहिए, तभी दिया गया दान अच्छा फल देता है। अपने को उंचा और सामने वाले को नीचा समझ कर दिया गया दान किसी भी लोक में पुण्य की प्राप्ति नहीं कराता है।

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