प्रभु ज्ञान जिसमें है समस्त पापों से मुक्त करने की शक्ति

Sri Sudha Shanksar Bajpai, Divine grace is transcendent. The scriptures say that by meditating on the true nature of God, all sins are destroyed. In the Srimad Bhagavad Gita, Lord Sri Krishna, while imparting knowledge to Arjuna, has described his true nature in detail.
पं0 श्री सुधा शंकर बाजपेयी

परमात्मा की कृपा अपरंपार होती है। शास्त्र कहते हैं परमात्मा के सच्चे स्वरूप का ध्यान करने मात्र से समस्त पापों का नाश हो जाता है। श्रीमद्भगवत गीता में प्रभु श्री कृष्ण ने अर्जुन को ज्ञान देते समय, अपने सच्चे स्वरूप का विस्तारपूर्वक वर्णन किया है। जब मनुष्य का जीवन पापों से घिर जाता है और उसे पापों के सागर से निकलने की कोई राह नजर नहीं आ रही होती। ऐसे समय में  निस्वार्थ भाव से प्रभु की शरण में आने वाले के समस्त पापों का नाश हो जाता है और निरंतर ध्यान और प्रभु वंदना से पुण्य की प्राप्ति होती है। परमेश्वर में ध्यान लगाने वाला मनुष्य ईश्वर में ही निवास करने लगता है, ऐसा मनुष्य जितेंद्रिय होता है। गीता में प्रभु श्री कृष्ण ने कहा है कि:

यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन।
कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते॥

हे अर्जुन! जो पुरुष मन से इन्द्रियों को वश में करके अनासक्त हुआ समस्त इन्द्रियों द्वारा कर्मयोग का आचरण करता है, वही श्रेष्ठ है। ॥7॥

निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः।
शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्॥

वह मनुष्य जिसका अंतःकरण और इन्द्रियों सहित शरीर जीता हुआ है और जिसने समस्त भोगों की सामग्री का परित्याग कर दिया है, ऐसा आशारहित पुरुष केवल शरीर-संबंधी कर्म करता हुआ भी पापों को नहीं प्राप्त होता ॥21॥

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यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम्।
असम्मूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते॥

जो मुझको अजन्मा अर्थात वास्तव में जन्मरहित, अनादि और लोकों का महान ईश्वर तत्त्व से जानता है, वह मनुष्यों में ज्ञानवान पुरुष संपूर्ण पापों से मुक्त हो जाता है ॥3॥

मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय।
निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः॥

मुझमें मन को लगा और मुझमें ही बुद्धि को लगा, इसके उपरान्त तू मुझमें ही निवास करेगा, इसमें कुछ भी संशय नहीं है ॥8॥

तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो येन केनचित्।
अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः॥

जो निंदा-स्तुति को समान समझने वाला, मननशील और जिस किसी प्रकार से भी शरीर का निर्वाह होने में सदा ही संतुष्ट है और रहने के स्थान में ममता और आसक्ति से रहित है- वह स्थिरबुद्धि भक्तिमान पुरुष मुझको प्रिय है ॥19॥

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